यह शोध पत्र दक्षिण एशिया के संदर्भ में भारत की उभरती हुई भूमिका का विश्लेषण करता
है, जो वर्तमान क्षेत्रीय गतिशीलताओं और उभरती रणनीतिक चुनौतियों से सम्बधित है।
शीतयुद्धोत्तर काल में भारत ने अपनी विदेश नीति को वैश्विक और क्षेत्रीय परिस्थितियों के
अनुसार पुनः संयोजित किया है और स्वयं को अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण संतुलन
कारक के रूप में स्थापित किया है। आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभाव में वृद्धि के बावजूद, भारत
को अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्रबंध करने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़
रहा है। दक्षिण एशिया क्षेत्र राजनीतिक परिवर्तन, आर्थिक आपसी निर्भरता, सुरक्षा चिन्ताओं और
विशेषकर चीन के बढ़ते हस्तक्षेप से परिभाषित हैा यह शोध पत्र पड़ोसी पहले की नीति का
आलोचनात्मक विश्लेषण करता है, जिसमें इसके उद्देश्यों, उपलब्धियों और सीमाओं पर विशेष
ध्यान दिया गया है। यह पड़ोसी देशों के बीच अविश्वास के स्रोतों, जैसे पहलों के माध्यम से चीन
के बेल्ट एण्ड रोड इनिशिएटिव के कारण बढ़ते प्रभाव के रणनीतिक निहितार्थों, और सार्क
;ै।।त्ब्द्ध तथा बिम्सटेक ;ठप्डैज्म्ब्द्ध जैसे क्षेत्रीय संगठनों की भूमिका का भी विश्लेषण करता
है। द्वितीयक स्रोतों पर आधारित विश्लेषणात्मक और वर्णनात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए यह
शोध यह तर्क प्रस्तुत करता है कि भारत को क्षेत्रीय कूटनीति में अधिक समावेशी, सहयोगी और
एक लचीले दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इस अध्ययन का मुख्य लक्ष्य सम्पर्क को सुदृढ़ करना,
आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देना और विश्वास निर्माण उपायों को मजबूत करना, दक्षिण एशिया
में स्थायी शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
पड़ोस प्रथम की नीति, क्षेत्रीय गतिशीलता, रणनीतिक चुनौतियाँ, चीन का प्रभाव, भू-राजनीति, क्षेत्रीय सहयोग, हिंद प्रंशात क्षेत्र