आधुनिक समय में तकनीकी एवं भौतिक सुख सुविधाओं के विकास के साथ-साथ मनुष्य के
मानसिक तनाव, एकाकीपन और अवसाद में भी तीव्रता से वृद्धि हुई है। वैश्वीकरण के इस दौर में
तनाव एक वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है। समाज में छोटे बच्चे से लेकर वृद्ध तक वर्तमान
समय में तनाव से घिरा हुआ है। आज की भागदौड भरी जिंदगी में तनाव एक अनचाहा मेहमान हो
गया है। आफिस के काम हो, पढाई का बोझ हो या व्यक्तिगत रिस्तो की उलझन तनाव किसी न
किसी रूप में हमें घेरे हुए है। जिससे व्यक्ति के स्वास्थय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। व्यक्ति
दिन-प्रतिदिन चिड़चिडे़पन एकाकीपन के गर्त में जा रहा है। दैनिक जीवन की कार्यशैली,
कार्यस्थल, घर-परिवार के आपसी सामजस्य के अभाव में व्यक्ति दिन-प्रतिदिन मानसिक शांति
खोता जा रहा है। तनाव को पूरी तरह खत्म करना संभव तो नहीं है, पर इसे प्रतिबंधित करना
हमारे हाथ में है। वर्तमान समय में तनाव के बढ़ते स्वरूप को देखते हुए इसके प्रबन्धन हेतु कई
प्रयास किए जा रहे हैं जो काफी हद तक तनाव प्रबन्धन में सहायक सिद्ध हुए हैं। तनाव प्रबन्धन
में साहित्य अध्ययन महत्वपूर्ण है। साहित्य केवल मनोरंजन का साधन मात्र नही वरन् यह मानव
मन के अन्तद्र्वंदों को समझने और उन्हें सुलझाने का एक सशक्त माध्यम है। तनाव प्रबन्धन में
साहित्य एक कैथार्सिस (विरेचन) और बिबलियोथेरपी (पुस्तक चिकित्सा) के रूप में कार्य करता
है। तनाव प्रबन्धन के प्रयासों में बिबलियोथेरेपी के सिद्धान्तों को हिन्दी साहित्य के माध्यम से
पुनव्र्याख्यायित करने का प्रयास है। साहित्य तनाव प्रबन्धन का एक महत्वपूर्ण साधन है। इस
शोध पत्र का मूल प्रश्न यह है, कि क्या शब्द केवल सूचना सम्प्रेषण का माध्यम है, या एक मौन
औषधि। जो दवा की भाॅति अवचेतन मन में छिपे मनोवैज्ञानिक आघातों को भरने की क्षमता रखते
हैं। साहित्य में अरस्तु के विरेचन सिद्धान्त से लेकर आधुनिक काल के साहित्य के माध्यम से तनाव
प्रबन्धन का विवेचन किया जा रहा है। हिन्दी साहित्य की कालजयी रचनाओं में निहित दर्शन और
संवेदना पाठक को ऐसी सुरक्षा, सुख प्रदान करती है, जो पाठकों को तनाव से मुक्ति दिलाने में
महत्वपूर्ण है। साहित्य व्यक्ति के भीतर सहानुभूति और आत्मसाक्षात्कार के बीज बोकर एक
संतुलित नागरिक, संतुलित समाज के निर्माण में सहायक है।
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